भीड़ में कुछ लोग होते हैं कुछ बाते होती हैं नए किस्से बुनते हैं कुछ बनते कुछ बिगड़ते हैं वो चेहरे जिन्हें भीड़ में पहचानना मुश्किल हो वो चेहरे जो शराफत का नक़ाब ओढ़े न जाने कितने मासूमो को अपना शिकार बना लेते हैं हवस इस कदर बढ़ जाती है मानो वो इसे मनोरंजन समझते हैं वहां कोई शोर नहीं होता कोई ज़ोर नहीं होता जो भी होता है वो चुपचाप हो जाता है हाँ कुछ लोग फरिश्ते भी होते हैं लेकिन उनकी संख्या शायद न के बराबर होती है ट्रेन, बस, मेले या कोई आंगन शिकार ढूंढते ये दरिंदे हर वक़्त हर जगह मौजूद होते हैं मानवता को शर्मशार कर किसी न किसी के मासूमियत से खेल रहे होते हैं मैं भीड़ आखिरकार कुछ कर भी तो नहीं सकता! ये तमाशा देखकर भी कुछ कर नहीं पाता और हाँथ पे हाँथ धरे मैं बस चुप हो जाता हूँ।