हक़ है हक़दार हैं जनता है सरकार है वही पुराने जुमले हैं वही पुराने वादे हैं नेताओं की बहार है  चमचे हैं जयकार है। पेट है परिवार है भुखमरी बेशुमार है लूट है खसूट है राशन का भंडार है। जो है तैयार है नेताजी का रिश्तेदार है झूठ है फ़रेब है जीभ है तलवार है। देश है द्वेष है आर है और पार है सेना है कश्मीर है पत्थर का कारोबार है दहशत के मेले में अब ख़ुदा ही मददगार है। क्रोध है विरोध है  दिलवाला और दिलदार है न्याय है अन्याय है हाँ न्ययालय भी बीमार है।