बेवजह एक किस्सा सुनाए जा रहा था मैं अपने ही धुन में गाए जा रहा था जो थे वो तो कब के जा चुके थे मैं ख्वाबों का महल बनाए जा रहा था उठ रहा था धुआं हाँ मेरे भी अंदर से मैं पानी को आग से बुझाए जा रहा था कोई चरसी तो कोई शराबी कह रहा था मैं मरीजों को दवाई पिलाए जा रहा था कुछ ऐसे भी थें जो घूंघट में छिपे थे मैं मुर्दों को आँचल ओढ़ाए जा रहा था वो खुश थे मुझे बेबसी में पाकर मैं आँसु की नदियां बहाए जा रहा था लोग नहीं भूले नाक़ाबलियत को मेरे मैं हर दिन ये किस्सा दोहराए जा रहा था