
बेवजह एक किस्सा सुनाए जा रहा था
मैं अपने ही धुन में गाए जा रहा था
जो थे वो तो कब के जा चुके थे
मैं ख्वाबों का महल बनाए जा रहा था
उठ रहा था धुआं हाँ मेरे भी अंदर से
मैं पानी को आग से बुझाए जा रहा था
कोई चरसी तो कोई शराबी कह रहा था
मैं मरीज
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