शीशे की बनी थी जाँ-निसारों की दुनिया गरम खूँ से सनी थीं अखबारों की दुनिया।   लोग कर्ज़ा चुका रहे थे ख़्वाब देखने का बड़ी ग़मगीन थीं चांद सितारों की दुनिया।   लोग जिस्म बेच रहे थे रोटी की चाहत में बड़ी रंगीन थीं कारोबारों की दुनिया।   सब भूल गए थे साहिल बरसने के हुनर को थीं बंजर सी सूखी  अबसारों कि दुनिया। © Sahil Mishra