आज के इस दौर में अगर सबसे ज्यादा चर्चे का विषय है तो वो है धर्म। जी नहीं मैं 'अहिंसा परमो धर्म:' की बात नहीं कर रहा। देखिए मुझे आप नास्तिक न समझें, लेकिन हाँ आपका मुझे आस्तिक कहना भी गलत होगा।

मेरा सवाल तो उन मूर्खों से है जो घण्टा बजाते हैं, जो माथे पर जालीदार टोपी भी पहनते हैं। या फिर सफेद लिबास में होकर भी धर्म की आड़ में अपना मुंह काला कर रहे होते हैं।

मेरे हिसाब से चीजें दो ही होती हैं, एक सही या फिर गलत। बाकि जो कुछ भी रह जाता है वो हमारे आपके मन का वहम होता है। मुझे याद नहीं कि मैं आखरी बार मंदिर कब गया था। मंदिर न जाने का कारण ईश्वर से नफ़रत तो बिल्कुल भी नहीं है। लेकिन हाँ, उसके होने के वजूद पर लोग जय श्री राम या अल्लाह ओ अकबर का नारा लगाकर एक दूसरे का कतलेआम कर देते हैं। मुझे बस इसी बात पर उसके होने शक होता है। सबने देखा होगा कि कभी कभी देश का न्ययालय भी इस धर्म के आगे घुटने देख देता है। अगर धर्म ही सबकुछ है तो इस न्यायालय की ज़रूरत ही क्यों पड़ी। इसका मतलब कहीं न कहीं हर उस इंसान को कहीं न कहीं किसी न किसी वजह से धर्म पर पूरा भरोसा नहीं है।

फेसबुक, ट्विटर पर लाखों की संख्या में धर्म के नाम पर बयान बाजी और गाली आपने अक्सर देखा ही होगा। धर्म का मुखौटा ओढ़े ये वही लोग हिट हैं जो भाई बेटा पति या देश का नागरिक होने तक धर्म सही से नहीं निभा पाते। यके वही लोग होते हैं जो मंदिर में मूर्ति पर दूध और पानी चढ़ाते हैं, और बाहर आकर सड़क के किसी कोने में टांग उठाकर मूत रहे होते हैं।

मंदिर में श्लोकों का उच्चारण, गुरुद्वारे में गुरुवाणी, मस्जिद में नमाज़ मानो इनके मुंह से अमृत बरस रहा होता है। और बाहर निकलते ही फिर से 

वही बहनचोद, मादरचोद, का इस्तेमाल हर दूसरे से करते हैं। ये अपने अपने ईश्वर को ठगना नहीं तो और क्या है। भंडारे के नाम पर सड़क जाम करना सड़क पर गंदगी फैलाना, गए कहाँ का धर्म और भक्ति है साहब।

इन सब कारणों से मैं उस ईश्वर की पूजा करूँ भी तो कैसे! 

एक तरफ तो उसे मंदिर में विराजमान कर दिया गया है और दूसरी तरफ फुटपाथ पर या सड़क के किसी कोने में उसकी तस्वीर टांग रखी है, और इस कारण से कि लोग वहां मूते न। और मेरे ख्याल से धर्म के ठेकेदारों का ध्यान शायद ही कभी इसके तरफ गया होगा।

मैं उस धर्म को भी कैसे मान लूं जिसकी वजह से एक देश के बीच सरहदी लकीर खींच दी गयी। मैं उस धर्म को भी कैसे मान लूं जिसके नाम पर राजनीति रोटियां सेकीं जा रही हैं।

मेरा सांस लेना हंसना, रोना रिश्ते निभाना नए दोस्त बनाना क्या किसी एक धर्म के वजह से ही मुमकिन है? अगर हाँ तो इसका जवाब कौन देगा कि धर्म के नाम पर ही लोगों का संहार कर दिया जाता है। अगर पूरे भारत मे किसी को अगर मूर्ख बनाया जाता रहा है तो वो धर्म ही है।

मेरी बातों से जिसे भी असहमति हो तो एक बार अपने अपने धर्म का चश्मा उतारकर देखो और खुद से ये सवाल पूछे कि वो किस धर्म से या किस धर्म के लिए पैदा हुआ था। 

ऊपर लिखी सारी बातें लेखक के खुद की अवधारणा है। इससे किसी भी धर्म जाती या व्यक्ति विशेष से कोई संबंध नहीं है।