वो मैदान ढूंढ़ रहा हूं
नहीं ऐसे शमशानों से सुनसान मैदान नहीं
जीते जागते , पसीने से सने हुए मैदान ।
ऐसे मातम मनाते ख़ामोश मैदान नहीं,
चीखते-चिल्लाते शोर मचाते मैदान ।
जहां कभी खून बह जाया करता था,
पैर छिल जाया करते थे, मोच आ जाती थी।
जहां ये गाय कुत्ते इतनी बेफिक्री से कभी बैठ ही नहीं सकते थे।
यहां तक कि तितलियां भी आने से डरती थी।
जहां झगड़े हो जाते थे, कपड़े फट जाते थे, गालियां गूंजती थी वो मैदान।
थूक के छीटों वाले मैदान , पसीने की गंध वाले मैदान , खून के धब्बों वाले मैदान।
उन हंसते, रोते , हांफते, करहाते, लड़ते-झगड़ते, झूमते - नाचते ज़िंदा मैदानों को सुना है किसी मोबाइल ने खरीद लिया है........


