कैसी ये कौताही है,

हाँ कैसी ये निठुराई है,

नि:सहाय है अन्नदाता,

ये कैसी नौबत आइ है।


जिस कृषक ने क्षुधा को तृप्त किया,

जिसने मन को संतृप्त किया,

है महामारी में सड़कों पर

क्यों इतना उन्हें है तृस्त किया?


जिसनें है सिंचा खेतों को,

हाँ अपने खू़न पसीने से,

अब खून पसीना आंसु बह रहे,

आंसु गोलों के गिरने से,

अरे पानी छीना, धरती छीनी, छीन रहे हो आंसु भी,

तुम मानव नहीं हो पत्थर हो, क्या हृदय नहीं है सीने में।


चलो माना की है राजनीती,

पर वे पात्र नहीं कठपुतली है,

ये विपदा बड़ी पुरानी है,

कहीं जानें इसने निगली है।

इतने बलिदानों को लेकर भी,

क्यों छटती नहीं ये बदली है।

क्यों आज़ादी के बाद बेड़ियाँ इनके लिये ना पिघली है।


जब सुखा पडे़ तो पानी ना, अब पानी की बौछारें है।

भारत माँ के असली बेटें अब सौतेलों से हारें है।

कही ठिठुर के मर ना जाऐं वो और माँ की उन्हें ना गोद मिले,

क्या शवों की दरी पे चलकर ही, हाँ बनती ये सरकारें है॥


अरे भीड़ जमा है महामारी में,

क्या प्रश्न नहीं प्रशासन पर।

हाँ रीढ़ की हड्डी तोडो़गे तो,

बैठोगे कैसे सिहांसन पर।

ये कारावास और एक कोटि दंड,

है निबन्ध कुशासन पर।


सहानुभूति से संवाद करो,

समानुभूति से तुम कष्ट हरो,

जो कारागृह में कैद कृषक है,

इस विगती से उनको मुक्त करो


कैसी ये कौताही है,

हाँ कैसी ये निठुराई है,

असहाय है अन्नदाता,

त्राहि त्राहि है ...


~Rishiraj A. Tare