होती नहीं परवाह मुझको, लोगों के बहकाने से.., मैं तो खुद ही बन गया हूँ, आवारा वीराने से..!!

है झंझट तो दूर रहो, मैं कहाँ बुलाता हूँ.., तुमलोगों की बातें सुनकर मैं तो खुद ही इतराता हूँ।

बुरा हूँ मैं फिर भी मुझे बुराई को परखना है, तुमलोगों के साथ रहते ही मैंने ये जाना है, है असीमित ये..!! या इनका भी कोई पैमाना है..??

परख रहा हूँ तुमलोगों को, कहाँ तक तेरी सीमा है..!! बेफिक्र रहो तुमलोग भी, इस जहां में मेरा ना कोई बीमा है।

तुम चलते रहो, सब दिख रहा है अनचाहे अनजाने से.... मैं तो खुद ही बन गया हूँ, आवारा वीराने से..!! मैं तो खुद ही बन गया हूँ, आवारा परवाने से..!!