गुमनामी की ज़िन्दगी नहीं चाहिए, हमने परिंदों से नाता जोड़ा है.. कुछ करने की ज़िद लेकर हमने इस जहां से नाता तोड़ा है। संभलकर गिरना, गिरकर संभालना मुझे बखूबी आता है.. मुझे क्यूँ लगता है, शोहरतों की बुलंदियों से मेरा नाता है। मुद्दत लाख बुरा चाहे तो क्या, हमने खुद को ही खुद से जोड़ा है.., कुछ करने की ज़िद लेकर हमने इस जहां से नाता तोड़ा है। ईक दिन वो मुझे शिद्दत से पुकारेगी, मुझे इस बात की आशा है.., कहीं ना कहीं इस ज़िन्दगी में फिर भी एक निराशा है। अब फूलों की चाह क्या रखें, जब खुद हमने पंखुड़ियों को मड़ोरा है.., कुछ करने की ज़िद लेकर हमने इस जहां से नाता तोड़ा है..!!