देख रहा हूँ तुझे मैं कब से
क्यूँ ना इन हादसों का नाम करतब दे दूँ
इधर उधर ना भटको जाना
आ जाओ तुझे मज़हब दे दूँ
कब तलक यूँ खड़ी रहेगी
अपनी आँखों को फैलाकर
यूँ रुआँसी सजती नहीं तू
आ जाओ तुझे मकसद दे दूँ
हुस्न तेरा है परियों सा
रूप छिटक सी जाती है
मन विचलित सा हो जाता है
जब चाँद चमक सी जाती है
एक धरोहर रखा था मैं
संग मेरे वो रहता है
अब सोचता हूँ किनारे कर दू
जब-तब तेरी ही बातें करता है
संभाल के कब से रखा हूँ सब कुछ
मिलो तो तुमको अनहद दे दूँ
यूँ रुआँसी सजती नहीं तू
आ जाओ तुझे मकसद दे दूँ
कब तलक यूँ खड़ी रहेगी
अपनी आँखों को फैलाकर
इधर-उधर ना भटको जाना
आ जाओ तुझे मज़हब दे दूँ
है नादां तू मतवाली सी
ना किसी को समझ में आती है
लेकिन ये जो तेरी दो आँखें है
वो आँखों में ही सब बता जाती है
मैं फ़क़ीरा मुफ़लिसी का
मुझसे ये छुप ना पाती है
ये जो तेरी परछाई है
ये सब बता के जाती है
गले लगाकर एक बार जाना
जो तू मुझको हैरत कर दे
खाकर कसम उस खुदा का
मैं तुझको अपना मुर्शिद दे दूँ
यूँ रुआँसी सजती नहीं तू
आ जाओ तुझे मकसद दे दूँ
कब तलक यूँ खड़ी रहेगी
अपनी आँखों को फैलाकर
इधर-उधर ना भटको जाना
आ जाओ तुझे मज़हब दे दू
चाह कर भी तुझे ना चाहा
ऐसी हमारी चाहत है
इस दिल के बेरंग चौखट पर
आज भी तेरी ही आहट है
बिन तेरे ये रात, रात नहीं है जाना
एक काली स्याह ज़माना है
और दर्द से भरी करवट है
तुम बिन मेरी तन्हाई का आलम
कुछ यूँ भी हो सकता है
बैसाख की सुखी ज़मीं पर
आंसुओं से भीगा मेरा सिलवट है
ईक बार पलट कर मुस्कुरा जो दो
तो मैं अपने दिल की सरहद दे दूँ
यूँ रुआँसी सजती नहीं तू
आ जाओ तुझे मकसद दे दूँ
कब तलक यूँ खड़ी रहेगी
अपनी आँखों को फैलाकर
इधर-उधर ना भटको जाना
आ जाओ तुझे मज़हब दे दू