ललक हो अगर हममें तो पा ही लेंगे हम
कौन सा बुरा वक्त रहता है हरदम
रोना-धोना पीर-पराई अब ये किससे पूछे कौन
सब दुखी है इस भौतिक काल में, अब खुश रहता है कौन
खुश रहने का नाटक तो करते है सब यहां
पर कौन कितना खुश है अब ये किससे पूछे कौन
जला देते है छत के कोने पर बैठकर हर वो पन्ना
बहुत पछता रहे है अब, लेकर कसम
ललक हो अगर हममें तो पा ही लेंगे हम
कौन सा बुरा वक्त रहता है हरदम
पास आने की ज़िद, दूर जाने की ज़िद
हमसे वो करता रहता है
एक वही मंज़िल है हमारी, जो हमसे रूठता रहता है
बाकी दुनिया बढे हुए नाख़ून है
बेकार है, फिर भी इसको काटे कौन
सुख नहीं है दोस्त, दुखों के चादर फैले है
पर इस दुःख को अब बांटे कौन
जिनसे है इसका सरोकार, व्यस्त है वो इस जनम
दूर खड़ा है, फिर भी अपना है
पा के रहेंगे इसको हम
ललक हो अगर हममें तो पा ही लेंगे हम
कौन सा बुरा वक्त रहता है हरदम