तन मन ये जीवन और फ़िर यौवन में रवानी हो जाए मन मस्त मगन हो जाए, ग़र ये जीवन पानी हो जाए अधरों में लटके, खालीपन से भरे जब ये मूर्ख इंसान फिर अपनों से लड़े जीवन की बगिया को हाथों से तोड़कर फ़िर वो पड़ोसी के हरियाली पे मरे मैल से खाली इंसान की जवानी हो जाए मन मस्त मगन हो जाए ग़र ये जीवन पानी हो जाए उन्मादी नदियों सा बहती रहे मदमस्त समंदर सा सहती रहे अग़र पतझड़ के पेड़ों सा झड़ जाए भी तो वसंत की खुशबू में फ़िर महकती रहे इंसानी फ़ितरत की ये कहानी हो जाए मन मस्त मगन हो जाए ग़र ये जीवन पानी हो जाए मिल जाए सब में मिला ले सबको ये जीवन कुछ ऐसी सयानी हो जाए आपस की बैर मिट जाए पांडव सी ये फ़िर कहानी हो जाए हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सब एक दूसरे के घर की दाना पानी हो जाए मन मस्त मगन हो जाए ग़र ये जीवन पानी हो जाए तन मन ये जीवन और फ़िर यौवन में रवानी हो जाए मन मस्त मगन हो जाए ग़र ये जीवन पानी हो जाए