बेकुसूर का तमगा ढोते-ढोते थक गया हूँ मैं क्या करूँ, जो मुझे गुनाह करना नहीं आता सिलवटों पर लेटे, तारे देखते हुए थक गया हूँ मैं क्या करूँ, जो मुंह ढककर मुझे सोना नहीं आता तुझे चाहता हूँ जिस्मों जान से, ये तेरे रूह को भी खबर है क्या करूँ, जो मुझे हर बात जुबां से बोलकर समझाना नहीं आता बज़्म-ए-दिल था, दौर चली थी साथी चुनने को। ख़ुशी हुई. . . गैर को चुना मेरी जगह साथ चलने को। ख़ुशी हुई. . . . क्या करूँ, जो दौलत के लिए मुझे खुद को बहलाना नहीं आता तेरे चेहरे की चमक के सामने, हसरत ख़त्म हो गई जीतने की क्या करूँ, जो मुझे अपनों को हराना नहीं आता बेकुसूर का तमगा ढोते-ढोते थक गया हूँ मैं क्या करूँ, जो मुझे गुनाह करना नहीं आता