तुम सोंती रही बेखबर.. हम सारी रात जागते रहे .. तुमहे देखने की अरमान लिये .. नींद से दूर भागते रहे .. बिखेरी जब जब हावाओं ने जूल्फे तुम्हारी .. ज़िस्म से निकल आती थी जान हमारी ... तुम जाग ना जाओं नींद से... कैद करनी थी हर एक पल तुम्हारी .. ज़लती रही रूह मेरी हावाओं की किस्मत पें.. जो छूँ के निकलती थी तुमहे और तुम्हारी खूसबु लिये .. ऊन हावाओं ने भी क्या किस्मत पायी थी ... उनहे मिली तुम और मेरी किस्मत मे तनहाई थी ..