नीला दुपट्टा ओढ़ा उसने तो ऐसा लगा जैसे समंदर को चेहरा मिल गया नीली नज़रों से जब देखा उसने तो मानो  आसमान चूर होकर मुझपर नीली छाप छोढ़ गया लफ़्ज़ों की ज़रूरत नही उसकी तारीफ़ के लिए उसकी तारीफ मे इस नज़्म की स्याही नीली हो गयी वो तो आई थी घटा की तरह मुझे छूकर चली गयी पर उसकी यादों के ज़ख़्म से आज तक दिल नीला पढ़ा हुआ है कहीं ना कहीं उम्मीद करता हूँ की फिर वो घटा आएगी एक दिन और नीला दुपट्टा मेरा कफ़न बनकर मेरी रूह को भी नीला कर देगा