चांद का समोसा मसल के जब तुम बादल की चटनी खुरच कर पीले होंठों पर उड़ाती थीं एक लाल कबूतर सरक जाता था छत की मुंडेर की बालकनी के तन्हा कॉर्नर के कोने में वो प्लूटो तक जाता ब्रह्मांड के पैजामे में अपने नाड़े की उलझती लहरों से ख्याल के जहाज बुनता बुल डॉग का ख़्वाब बजता है दरवाज़े पर, मासूम सी बुल शिट से ग्रैफिटी के सुर लगाता है उन रंगों की चादर चाट कर शहर के घंटाघर की घड़ी सोई है वक़्त के छीटों की कसम खाओ और एसएमएस करो क्या तुम मुझे सय्यारों पर स्विमिंग करते हुए किसी कैफे कॉफी डे पर मिलोगे? हम वहां ज़िंदगी की खनकती हुई कॉफी पिएंगे.