एक रात जब आँख खुली और
पाया खुद को सपनों के नगर में
पाँव छिले तब देखा हमने
टूटे सपनें बिखड़े हैं डगर में
इस दुनिया के कपट से डर के
कुछ अपनों के घाव से मर के
अपनों के ही तंज से घायल
सपनें यहाँ तड़प रहे थे
अंदर के द्वंद्व नें जकड़ा
एक सपने नें दूसरे को पकड़ा
यूँ ही मन के पशो पेश में
सपने आपस में उलझ रहे थें
देखा मन के सपनों का मेला
हर सपना यहाँ खुद में अकेला
अधूरा है पर खुद को पूरा करने में
एक दूजे पर सपनें झपट रहे थें
ख़्वाहिशों की भी अपनी गली थी
शायद कभी खूब फूली फली थी
हालातों के आग में झुलसे
कोनें में अरमाँ दुबक रहे थे
कभी न पूरे होते सपने
कहीं शून्य में खोते सपने
अपने ही हालातों में उलझे
कुछ सपने बस सिसक रहे थें
अरमानों की काठ थी सूखी
और सपनों में लौ बची थी
समय बलिष्ठ नें आग लगा दी
धूँ धूँ कर सपने सुलग रहे थें
- ह्रषीता ‘दिवाकर’ गुप्ता


