सत्य घटना पर आधारित
महीने भर पहले की बात है। एक भद्र महिला एक दिन अपने दिव्यांग बेटे के साथ बैंक आयी। उसे बेटे के नाम से खाता खुलवाना था। मेरे काउंटर पर महिला अकेली ही फॉर्म तथा अन्य कागजों के साथ पुष्टि के लिए पहुचीं। मैनें जैसे ही फॉर्म हाथ में लिया, मेरी नज़र उस बच्चे के फ़ोटो पर पड़ी जो उस फॉर्म में लगी हुई थी। पहली नज़र में बच्चे की उम्र करीब 5 या 6 साल मालूम हुई। एक दिव्यांगता के प्रतिशत वाला सर्टिफिकेट भी था। प्रतिशत 80 था। मैंने पूछा " बच्चे को लायी हैं? " उन्होंने बेंच की ओर इशारा करते हुए दिखाया कि बच्चा वहाँ है। मैंनें देखा एक लगभग 15 साल की लड़की बच्चे को गोद में लिए बैठी थी। महिला तब तक बोल पड़ी , " मैडम थोड़ा जल्दी खुलवा दीजिएगा खाता। बच्चा का विकलांग पेंशन रुका हुआ है।" मैनें जब उनकी ओर देखा तो गौर किया कि महिला की आंखों में एक थकान और हताशा सी थी। अजीब सी बेचैनी। मानो नाउम्मीद हो गयी हो। मैनें आश्वासन देते हुए पूछा कितना पेंशन आता है ? उन्होंने जवाब भी दिया जो मुझे याद नहीं। याद है तो बस उनके आंखों की बेचैनी। जाते जाते पता नही क्या उनके मन में आया। वो बच्चे को गोद में लिए फिर से मेरे पास आयीं। बोली मैडम यही है बच्चा। मैनें उम्र पूछा तो बोली 11 साल का है मैडम। लगता नही है। मैनें जैसे ही बच्चे की ओर देखा , मैनें पाया कि बच्चे की नज़र भी मुझ पर है। ऐसी तल्ख नज़र। मानो सब कुछ समझ रहा था और एक सवाल कर रहा हो कि क्यों? अपने आसुओं को नहीं रोक पायी और बेतहाशा रो रही थी मैं। मन में हज़ारों ख़याल मानो एक दूसरे से कुश्ती लड़ रहे थे। मैं यह सोच के द्रवित हो रही थी कि ये संघर्ष आखिर किसका था? उस 11 साल के बच्चे का जो इतना असहाय था कि अपने दम पर हिल नहीं पाता था। या उस जननी का जिसने उस बच्चे को न केवल 9 माह कोख में रखा बल्कि 11 साल से गोद में लिए घूम रही थी। वो धीरे धीरे कदम बढ़ाती खुद को जैसे घसीटते हुए शाखा परिसर से चली गईं। पर खाता खोलने के फॉर्म के साथ मेरे मन को बोझिल करने वाले हज़ारों सवाल मेरे टेबल पर छोड़ गयीं। उनका खाता तत्काल खुल भी गया।2 दिन बाद आ कर पासबुक भी ले गईं। मैनें बच्चे का कुशल मंगल पूछा तो बोलीं कि उसका इलाज चल रहा है।
आज करीब 1 महीने बाद वो फिर आयीं। अपने साथ वही पासबुक लाईं थी। पर आज उनकी आँखें और भी ज़्यादा खाली थीं। जैसे कोई वीरान खंडहर। पासबुक ले के मेरे टेबल की ओर आयीं। पासबुक मेरी ओर बढ़ा के पूछी," मैडम जरा चेक कर के बताइये न कोई पैसा आया है क्या?" मैंने चेक किया और न में सिर हिलाया और जैसे ही कंप्यूटर से नज़र उठा के उनकी तरफ देखा आँखों से अश्रुधार को रोकने के असफल प्रयास के साथ कंपकंपाते स्वर में बोली , "मैडम खत्म हो गया वो" और आंसुओं को रोकने की कोशिश भी छोड़ दी। मेरे पैरों तले की ज़मीन मानो खिसक गई। उस दिन जब उस बच्चे से नज़रें मिली थी तो एक अदृश्य रिश्ता बना था। दर्द का रिश्ता। मैं अंदर ही अंदर खुद को संभाल रही थी। अथक प्रयास कर रही थी कि आँसुओं को रोकी रखूँ। तब तक वो माँ जिसने कुछ दिन पहले ही प्रिंस को अपनी गोद से सदा के लिए अलग किया था, पासबुक की तरफ इशारा कर के बोली ,"ई तो अब किसी काम का नहीं है मैडम। इसको बन्द ही कर दीजिए। क्या करना होगा इसको बन्द करने के लिए?" मैनें उन्हें डेथ क्लेम का फॉर्म दे कर विदा किया। आज फिर मेरे अंदर एक तूफान को जगा कर वो चली गयी। मैं उसे जाते देख सोच रही थी कि उस दिन तो गोद मे बच्चे का भार था। पर आज भी देख के ऐसा लग रहा था जैसे कुछ बहुत भारी सा उठाये किसी तरह चल रही है। फिर मन ने जवाब दिया , " शायद दुःख का भार उठा रही है। बेटे के शरीर से कही अधिक भारी। "
रात को भी जब बिस्तर में नींद के इंतजार में लेटी थी तो बार बार उस बच्चे की वो तल्ख नज़र मेरी आँखों के आगे आ कर नींद को कोसों दूर भेज देती। मैं सोचने लगी कि क्या कारण रहा होगा उस बच्चे का इस संसार में आने का, इतने असहाय जीवन का, इतनी छोटी आयु का, इतने मार्मिक मृत्यु का। अचानक जैसे किसी नें कान में भीष्म का नाम कहा। कोई नही था। मन की ही आवाज़ थी। पर जवाब मिल गया मेरे सवालों का।सहसा याद आ गयी एक पौराणिक कथा। गंगा पुत्र देवव्रत की। देवव्रत के देवव्रत से भीष्म तक के सफर की। भीष्म के संघर्षपूर्ण जीवन की। और भीष्म के जन्म से पूर्व उसके पिछले जन्म व महत्वाकांक्षा पूर्ण जीवन की और उस श्राप की जो ऋषि वशिष्ठ नें वसूओं को दिया था जो भीष्म के जन्म , उनका संघर्षपूर्ण लंबा जीवन तथा उनके 7 बड़े भाइयों के जन्म व तत्काल मृत्यु का कारण बना।
पुर्नवासी की रातों में जैसे सागर से लहरें हुंकार भरती हुई उठती हैं और फिर सागर में ही मिल जाती हैं, ठीक वैसे ही मन की अस्थिरता को मन के ही जवाबों नें शांत किया। पूर्व जन्म का कोई अभिशाप ही था शायद जो इस जन्म में फलीभूत हुआ था। वो बच्चा अन्य सात वसुओं की तरह उस अभिशाप को जी चुका और मुक्त भी हो गया शायद। पर भीष्म की तरह उस माँ को अभि और भी जीना है। संघर्ष और पीड़ा के साथ। एक सत्य यह भी है कि परमात्मा किसी की नीयति में जब संघर्ष लिखते हैं, उस मनुष्य को संबल और धैर्य भी देते हैं संघर्ष से जूझने का। हम सब या तो अपने पिछले कर्मों को जी रहें हैं या भविष्य के जीवन की आधारशिला बनाने वाले कर्म ही कर रहे हैं। जो भी करें बस इतना ध्यान में रखे कि हमारे कर्म अथवा वचन किसी के मन को व्यथित न करें।
© हृषीता 'दिवाकर'


