खाण्डव वन को नगर बना

पांडव वहाँ थे बस गए

था समृद्ध अब राज्य वहाँ

चारों दिक् में यश गए


मनमोहक था और मायावी

इंद्रप्रस्थ का वो महल

दुर्योधन ने की थी अब 

मित्रता की एक पहल


मैत्री के वर्ण को और भी 

कुछ गहरा करना था उसे

या रण भेरियों की ध्वनि से 

जग को बहरा करना था उसे


थी कुटीलता मन में भरी

कौरव ने निमंत्रण दिया

सुन कर भीम कुपित हुआ

विरोध में गर्जन किया


पर पा कर निमंत्रण तात से

युधिष्ठिर कुछ अघाते थे

स्वीकार कर निमंत्रण हस्तिनापुर का

महाराज राजधर्म निभाते थे


हुए तैयार रथ और 

तैयार हुई पालकी

चले हस्तिनापुर को पांडव

और राजकुमारी पांचाल की


हस्तिनापुर में सहृदय मिले पांडव 

गुरुओं से और परिजन से

पर धो न पाए थे कौरव

राग और द्वेष अपने मन से


द्यूत का था सजा मंच

मंच पर थे शकुनी के पासे

पासे वो जादुई बने थे

हाड़ के सुबल की जंघा से


दुर्योधन ने धर्मराज को

दाव खेलने को बुलाया

और दुर्योधन की तरफ़ से

शकुनी खेलने को आया


सर्वस्व हार चुका पांडवश्रेष्ठ

हार बैठा था हर एक गाँव गाँव

भूमि बची न इतनी भी कि

धर सके अपने भी पाँव


शकुनी के पासों का था कमाल

षड्यंत्र का गहरा था मायाजाल

युधिष्ठिर द्रौपदी को भी हार बैठा था

दुर्योधन अपनी जीत पर ऐँठा था


फिर क्या था दुर्योधन ने

द्रौपदी को सभा में बुलवाया

केश खिंच कर लाने का रानी को

आदेश दुस्शासन को सुनाया


कुलवधु को नोचने में 

दुशासन तनिक न सकुचाया

कौरवों की धृष्टता को

और भी गंभीर बनाया


चीखती याचना करती आयी

सभा में द्रौपदी रजस्वला थी

प्रतिषोध लेने की कौरवों तुम्हारी 

बताओ ये कैसी कला थी


केश खिंचते चीर हरण को

सभा में जिसको घसीट लाए थे

महारानी थी इंद्रप्रस्थ की

देव भी क्रन्दन सुन थर्राए थे


अन्याय हो रहा था भीषण

और कर्ण हर्षाता था

मित्र था अगर तो क्यों नहीं

मित्र को सतमार्ग दिखलाता था


सभा में द्रोण चुप्पी साधे 

अनंत को तक रहें थे

सम्भवतः द्रुपद से अब भी 

बैर मन में रख रहें थे

अन्यथा क्यों मौन थे 

जब नारी पर आयी 

गहन विपदा थी

अम्बर हरण हो रहा था जिसका

क्योंकि वह द्रुपद सुता थी???


सब गूँगे बने बैठे थे

शूरवीर सारे असहाय थे

मात्र विदुर हुए विचलित और बोले

पर हाय! राजद्रोही कहलाए थे


याचना करती दया की

रोती रोती थक रही थी

अपने अश्रुओं को अबला

असहाय हो कर चख रही थी


पाँच पति थे द्रौपदी के

पाँचों ही चुप खड़े रहें

कौरव भी अपनी धृष्टता पर

बेशर्मी से अड़े रहें


हाथ जोड़ कर अब पांचाली

कृष्ण नाम जप रही थी

अपमान की अग्नि में 

धूँ धूँ कर तप रही थी


गोविंद सखा थे द्रौपदी के

कहते थे बुआ पृथा को

गोपाल नें सुनी पुकार

और बचाया द्रौपदी की अस्मिता को


द्यूत साधारण नहीं था वो

न थी वो सभा ही साधारण

बीज बोया गया था उस दिन

होने वाला था महारण


दिवस बीते मास बीते और

वर्ष भी बीत गए

कौरवों को भ्रम था कि 

वे पांडवों से जीत गए


द्रौपदी थी वन में श्रापती 

कुरूवंश को केश खोले

प्रण था खुले रहेंगे केश

जब तक न दुस्शासन के रक्त से धो ले


कालचक्र था घूमता 

धीरे धीरे आयी घड़ी

युद्ध होना था लिखा

होनी थी परीक्षा कड़ी


नारायण के सभी प्रयासों को

दुर्योधन नें ठुकड़ा दिया

पाँच ग्राम दूर गए

भूमि का एक न टुकड़ा दिया


थी अब सेनाएँ सजीं

रण का डंका था बजा

थे शुरमा सारे सशस्त्र

रथ भी था क्या खूब सजा


शंख बजें और बजे बिगूल

चली तलवारें और चले त्रिशूल

नारायण थे सारथी पार्थ के

परिस्थिति थी कौरवों के प्रतिकूल


छल से अभिमन्यु को घेर कर

चक्रव्यूह में मारा था

हर बार कौरवों ने लिया था

छल का ही सहारा था


रकतरंजित था कुरुक्षेत्र

लाशों से पटी थी धरा

दोनों पक्षों से लड़ते लड़ते

हर बार कोई पुत्र मरा


छली कौरवों से निपटने में

पांडवों ने भी धर्म छोड़ा

सूर्यास्त होने पर भी भीम ने

दुर्योधन की जंघा को तोड़ा


अठारह दिन तक कुरुक्षेत्र में

भीषण रक्तपात हुआ

दुर्योधन की मृत्यु पर

घनघोर रण समाप्त हुआ


पुत्रों की मृत्यु पर 

धृतराष्ट्र बिलख रहे थे

निद्रा में भी लाडले

दुर्योधन का नाम जप रहे थे

असहाय बन मूक बैठे थे जब

नारी की अस्मिता पर आघात हुआ

फिर क्यों रोते हैं धृतराष्ट्र 

जब पुत्रों का रक्तपात हुआ


अहंकार और द्वेष नें

धृतराष्ट्र को निर्वंश किया

दुराचार ने न जाने

कितना ही विध्वंस किया


हर बार जब भी कोई 

नारी लूटी जाएगी

चीत्कार नारी की आकाश को चीर

यम को खींच कर लाएगी


पापियों को अबला का 

अभिशाप ही ले डूबेगा

वंश को कुछ और नहीं

संताप ही ले डूबेगा


© ह्रषीता ‘दिवाकर’