किसी पुराने शहर सा लगता है ये इश्क़ तेरा

सुना सुनाया सा है

पर अनजानी सी भी हैं कई गलियाँ इसकी

ग़म छुपा कई मोड़ों में

दर्द भरी ठिठोलियाँ इसकी

किसी पुराने शहर सा है इश्क तेरा

दूर उन पगडंडियों पर देख

तेरे ख़यालों का कारवां सा निकला है

तसव्वुर तेरा एक गली से निकल के दूसरी में खो जाता हो ऐसे

उस गली के दूसरे छोर पर खड़ा हो तु उसको थामने जैसे

पुरनवासी की चांदनी जैसे झिलमिला उठी हो आब में

हाँ वही ठंडक है तेरे इश्क़ के अज़ाब में

- हृषीता ‘दिवाकर’ गुप्ता