दरख़्तों के साये से भी उठती हैं यूँ लपटें,

शजर के तले लोग मशाले लिए बैठे हैं।

माँ की लोरियाँ भी लगने लगी हैं फीकी अब,

वो धोखे के ऐसे हसीन तराने लिए बैठे हैं।

कि सच रु ब रु है पर नज़रें बचाएं चल रहे हैं,

खूबसूरत से ऐसे वो बहाने लिए बैठे हैं।

कि दरिया में डूबता है वो सुनते हुए ठहाके,

हमदर्द कहता था जिसको वो नाव किनारे लिए बैठें हैं।

गिरता है बार बार अंधेरों में भटकता सा-

उसके साथी छुपा के दामन में चाँद और सितारे लिए बैठे हैं।

दिल मिलते नहीं पर गले मिलते हैं फिर भी,

अजी वो रिश्तों में गहरी दरारें लिए बैठे हैं।

नज़रो से हो ख़ाक ये मंज़र,

वो अपनी आँखों में ऐसे अँगारें लिए बैठे हैं।

कि जल जाए मोहब्बत की हर एक मिसाल,

बेरुखी के वो ऐसे नज़ारे लिए बैठे हैं।

खिज़ाओं से कह दो कि बदल जाएगी ये रुत जल्द ही,

हम अपनी बाहों में सुर्ख वो बहारें लिए बैठे हैं

जो ज़माने के तोड़े से न टूटे

आँखों में इश्किया वो सपने सारे लिए बैठें हैं

©ह्रषीता ‘दिवाकर’ गुप्ता