डर इस बात का नहीं

कि शकुनि फिर

छल कर सकता है

डर इस बात का नहीं 

कि युद्ध में

पराजित होना पड़ सकता है

डर इस बात का नहीं

कि कोई कर्ण पुनः

दुर्योधन के लिए लड़ सकता है

डर इस बात का नहीं

कि अर्जुन

रणभूमि में मर सकता है

डर केवल इस बात का है

कि द्रोणाचार्य को खुश करने में

एकलव्य का अंगूठा कट सकता है

डर केवल इस बात का है

कि एक भूल के कारण फिर से

कुल दो भागों में बँट सकता है

डर केवल इस बात का है

कि फिर से द्रुपद सुता को

लज्जित होना पड़ सकता है

डर केवल इस बात का है

कि अभिमन्यु को खोना पड़ सकता है

डर केवल इस बात का है

कि केशव का भर्सक प्रयत्न

फिर से अब के विफल न जाए

डर केवल इस बात का है

कि अपनों के ही रचे प्रपंच में

अपना ही कोई फिसल न जाए

डर केवल इस बात का है

कि लाक्षागृह इस बार कहीं

पांडव के संग जल न जाए

डर केवल इस बात का है

कि इतना सब कुछ होने पर भी

डर केवल इस बात का है

कि लगभग सब कुछ खोने पर भी

सर्वस्व हाथ से निकल न जाए

डर केवल इस बात का है

कि सिंघासन के लोभ के कारण

परिजन की नियत बादल न जाए

डर केवल इस बात का है

कि कुकर्मों के दोहराव के कारण

काल का पहिया चल न जाए

©️ह्रषीता ‘दिवाकर’ गुप्ता