कोई चिंगारी न जला दे ज़माने को 

महफ़ूज़ रख दिल में आग ले कर चल रही हूँ

सुर्ख़ जो छींटे दिखते हैं मेरे शक्सियत पर

मैं तुम्हारे इश्क़ का दाग ले कर चल रही हूँ

हदें होती होंगी दुनिया के लिए मोहब्बत में

मैं जज़्बा अनहद का बेबाक ले कर चल रही हूँ

तंज़ करते हैं हमसाए भी रक़ीब भी

मैं नज़रंदाज़ का अन्दाज़ ले कर चल रही हूँ

पंख कतरते हैं वो जो बनते हैं ख़ैर ख़्वाह मेरे

मैं टूटे परों में समेट परवाज़ ले कर चल रही हूँ

मालूम है मुझको भी मुखौटे के पीछे एक एक शक़्स के नाम

 मौके पर खोलूँ मैं ऐसे कई राज़ ले कर चल रही हूँ

मेरी कश्ती क्या डुबाएगा मुझको डुबोने वाला

मैं जेब में अपने जहाज़ ले कर चल रही हूँ

बे आबरू करने वाले औरों को ये भूल जाते हैं मगर

मैं दामन में सहेज कर उनकी भी लाज ले कर चल रही हूँ

तौहीन करते हैं ये लोग तुम्हारा नाम ले कर सर ए आम लेकिन

मैं सर पर तुम्हारी उल्फ़त का ताज ले कर चल रही हूँ

क्या बेइज़्ज़त भी होते हैं प्यार करने वाले यहाँ

मैं तो तुम्हारे नाम का नाज़ ले कर चल रही हूँ

ख़त्म कहाँ होती हैं दास्ताँ ए मोहब्बत यूँ हीं

मैं आँचल में छुपा कर आग़ाज़ ले कर चल रही हूँ


- ह्रषीता ‘दिवाकर’