जीवन के इस काल चक्र में

कुछ पाने कुछ खोने के क्रम में

छूट रही हैं मानो सदियाँ

बस कुछ क्षण को संजोने के भ्रम में।

एक खिलौना ही है मानव

डोर है किसकी किसके हाथों में

नाच रहा है खुद ही बेसुध

औरों को नचाने के क्रम में।

लगी शर्त जब मानव जगत में

कौन विजेता बना रहेगा

भाग्य का पलड़ा भाड़ी था परंतु

शक्ति थी कहि अधिक रे श्रम में।

सत्य है आज और कल भी रहेगा

काल ये चिल्ला चिल्ला के कहेगा

मोह माया है ये धन ये दौलत

प्रेम ही सदा अमर रहेगा।

- हृषीता 'दिवाकर' गुप्ता