शब्द शब्द और मात्र शब्द
लाचारों की बस्ती है हम ,
कभी हंसी थी जिन चेहरों पर
रुला रहा है बस कष्ट ही कष्ट।
दुनिया के रंगो को देखा था
दूर नजर किया तो बस सूनापन ,
हल नहीं सूझता हलचल मन में
हाथ थामे तो भी रहता डर।
धड़कन की धड़क भी चल रही
तो लक्ष्य बिना उस तन का क्या
भागदौड़ भरी जिंदगी के उस तड़पन में ,
यूं ठहरे तो कचोटता है भारीपन।


