कुछ लोगों की हैसियत ही नहीं,
और इल्ज़ाम लगाने चले थे।
हमने उन पर वार दिए सारे कर्म,
जिसने हमारे ईमान कुचले थे।
अब ये फैसला मुझे करना था,
हम उनसे प्यार बहुत करते थे।
आओ मेरे गुरूर-ए-महफिल में,
हम बर्बाद कितनो को करते थे।
फैसला अब तुम कर नहीं सकते,
खुदा की कसम खाया करते थे।
अब तू पूछेगा 'हर्ष'से रो के भाई,
क्या आप कभी माफ करते थे।


