मुझे अब तो डर भी लगने लगा है .. कल खाना खाते वक़्त माँ ने मुझसे पूछा की अगर कोई लड़की पसंद हो तो बता दो ! सच कहु मैंने सर झुका कर मना कर दिया , क्या कहता उनसे ये तो संभव नहीं है न बचपन से ही तो पड़ते आ रहे है हम तुम ने भी तो किताबे कम नहीं पड़ी मुझसे मैं लाचार हु या बेवफा ? इसका फैसला तुम ही करलो .. तुम्हे भी तो मेरा लिखना पसंद है न , पर तुम तक मेरे खत क्यों नहीं पहुंचते जवाब है क्या तुम्हारे पास ? वो कबूतर तो बेवफा नहीं होगा  न उसकी नियत धोका देने की लगती थी हाँ हो सकता है की उसे भी मुल्क समझ में आने लगे हो  .. अब तुम ही बताओ मैं  कैसे बोलू पापा को की  तुम्हारा मुल्क अलग है ! और इतना ही नहीं वो मुल्क जिसे हमारे यहाँ के कबूतर भी पसंद नहीं करते ! अब जब भी कभी बात होती हैं तो मुझे तुम्हारे मुल्क की बुराई लोगो के मु से रास  नहीं आती.. जब भी नींद नहीं आती तो मैं यही सोचने लगता हु की पापा से सिर्फ इतना बोल दू .. की मुल्क भले ही अलग हो पर इंसान बुरे नहीं हो सकते ... फिर ये ख्याल भी तो आता है की .. अब ये कौन तै करेगा की बुरा कौन हैं.. सुनो मैंने पापा से कह दिया आज की मुझे तुम्हारे मुल्क के लेखक पसंद है.. आज रात को ६ रात हो जायेगी ,मेरे घर पर एक बेटे और बाप में बात नहीं हो रही.. हिसाब मत पूछना और न कहना की खत लिखने बंद कर दिए क्या ... खत तो आज भी लिखता हु पर अब मेरे संदूक में कैद है .. किसकी गलती है अब ये जाने दो ,,पर वो कबूतर भी तो तुम्हारे मुल्क नहीं जाते.. और हाँ माफ़ करना .. पर मुझे अब रात को नींद आने लगी हैं .. तुम भी सो लिया करो .. इंतज़ार करता हु में खावो में तुम्हारा सुना हैं वहां सरहदे नहीं है...