रात को सोती इस दुनिया को देखता हूँ,

खूद को पानी की तरह बहता देखता हूँ | कितनी शांत हो जाती हैं ये दुनिया,

जब चाँद को आसमा में चढ़ते देखता हूँ | इस अँधेरी रात में किसी दिए को जलते देखता हूँ,

कुछ खूद को खुदी में जलते देखता हूँ। दिन के बौझ से थक जाती हैं दुनिया,

फिर रात को चुप से सोती इस दुनिया को देखता हूँ। दूर दूर जहा भी देखता हूँ,

इस भाग दौड़ कि दुनिया में शान्ति पनपते देखता हूँ। कास  रोक लू इसे हमेशा यूँही,

पर फिर से सूरज को चढ़ते देखता हूँ। सूरज की नयी किरन देखता हूँ,

फिर खुद को उस रोशनी को निहारते देखता हूँ। कुछ ऐसा हर रोज देखता हूँ,

किसी की आँखों में नमी तो किसी की आँखों में ख़ुशी देखता हूँ। कुछ इस तरह मैं ज़िन्दगी को देखता हूँ,

मुश्कुराते हुए खुद को खुदी में देखता हूँ।