उड़ चला उन हवाओं के साथ, खूद जिनका नहीं था ठिकाना ले चलीं कुछ ऐसी जगह, जहाँ न जमीं थी, ना आसमां एक पल तो डर गया था सपनों से, यकीन तब हो गया जब थाम कर हाथ मेरा कुछ ऐसा कहा “चलो थोडा जी लेते हैं |” चल पड़ा उन हवाओं के संग-संग राह में थोड़ी आँख क्या लगी और वो सिलसिला वही ख़त्म-सा हो गया रोक तो नहीं सका उसे, पर कर लेता हूँ महसूस कभी-कभी उड़ चला था उन हवाओं के साथ, खुद जिनका नहीं था ठिकाना छोड़ चली कुछ ऐसी जगह, जहाँ ना बातें थी ना ख़ामोशी बस कुछ धुंधली-सी यादें थी और “मैं”..
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