एक राह नयी ढ़ूडता हूँ ,
जब-जब मैं तुम्हे सोचता हूँ ।
ढूंडता हूँ एक नयी वजह जीने की,
जब-जब याद "वजह"  पुरानी करता हूँ । जीने कि नयी आस ढूंडता हूँ ,
जब-जब महशूस पास तुझे मैं करता हूँ । लम्बी है ज़िंदगी, जीने का साहस इसे मैं रखता हूँ ,
जब-जब महशूस साँस मेरी मैं  करता हूँ । सिमट सा जाता है सब कुछ तूझी में ,
जब-जब पास "तुझे" मैं पाता हूँ। हँस के खील-खिलाने लगता हूँ ,
जब-जब याद वो "यादें" करता हूँ । फिर यूं ख़ामोश-सा हों जाता हूँ ,
जब तूझे अपने साथ ना पाता हूँ । क्यों आज भी सिमटी हुई है दूनिया तूझी में ,
जब साथ नही तु मेरे फिर भी । इतनी भीड़ में खूद को अकेला पाता हूँ ,
जब-जब याद तूझे मैं करता हूँ। एक राह नयी ढ़ूडता हूँ , जब-जब याद राह पुरानी करता हूँ।