कहते है बचपन कब गुज़र जाता है पता ही नहीं चलता,

तब सिर्फ गलियां थी,

और आज वो

"बचपन की गलियां" है |

तब सिर्फ बातें थी,

पर आज

"बचपन की यादें" है |

कितना कुछ बदल गया है,

पर नहीं बदला तो वो कच्छी

सड़क पे छोटा सा स्टेडियम है

पर वो भी अब

"बचपन का स्टेडियम" है |

बदलते वक़्त ने सबको बदल दिया,

अगर कुछ नहीं बदले तो वो दोस्त है

पर अब तो वो भी

"बचपन के दोस्त" है |

काश ये बचपन, बचपन ना होता

काश हम इसे बचपन ना कहते

और ना हि कोइ नाम देते

मुझे तो इसका नाम भी तब पता चला

जब ये गुज़र गया

ये

"बचपन"