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किधर जाए

बस धुआँ है जहाँ तक नज़र जाए हाल एसा हो तो आदमी किधर जाए एक ख़्वाहिश है के मेरी खुदी के आगे वो भी  टूटे और टूट के बिखर जाए अब मेरी अपनी कोई मंज़िल ही नहीं चला जात
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