यह क्या मुसीबत आयी है।।

घर होते हुये भी ज़िंदगी

रास्ते पर ले आयी है

जिस पथ का न था पता

मुसीबत ने उस पथ पर

मीलों पैदल ले आयी है

यह क्या मुसीबत आयी है।।

दो वक़्त की रोटी के लिए

ज़िंदगी ने मीलों पैदल चलायी है

भुखा प्यासा रख घर पहुँचायी है

ज़िंदगी फिर अपनो से मिलायी है

घर की रोटी आज फिर नसीब आयी है

यह क्या मुसीबत आयी है।।