बनी-बनावटी शक्लों से,
मेरा मिजाज वाला चेहरा ही सही।।

फरेबी की महफिलो से,
मेरा अकेलापन हि सही।।

हरे-भरे ढोंग से सजता हो नगर,
इसे-बेहतर मेरा उजडा शहर ही सही।।

दोगले-मन के चरित्र से,
मेरे मन का ना होना ही सही।।

मतलबी बेजार चर्चाओ से,
मेरी खामोशी ही सही।।

तुम्हारी सच्चाई की निचाई से ,
मैं बुरा और मेरी बुराई ही सही।।
 

                                         -हितेशकुमार'असीम'