हरे जंगल जो कटते जा रहे हैं
यहाँ मौसम बदलते जा रहे हैं
किधर जाएँ यहाँ से अब परिंदे
नशेमन सब उजड़ते जा रहे हैं
ज़रा सोचो बुझेगी प्यास कैसे
नदी, पोखर सिमटते जा रहे हैं
नई तहज़ीब में ढलता ज़माना
सभी ख़ुद में सिमटते जा रहे हैं
सिखाते हैं सलीक़ा दीये हमको
हवाओं में जो जलते जा रहे हैं
तरक़्क़ी हो रही बे-शक हमारी
मगर जज़्बात मरते जा रहे हैं
© हिमकर श्याम


