नया सवेरा

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मन मेरा हो रहा खिन्न है ,

ना जाने क्यूं चित्त बेचैन है,

हो रहा हर ओर अश्रु पात है,

जाने केसी ये विशात है,

सोच कर दुनिया की दशा,

होता मेरे हिर्दय में वज्रपात है,

ना जाने किस बात का ये शाप है,

हो रहा धरती पर विनाश है,

दुखों का टूटा कहर है ,

हर शहर गाउं में फैल रहा ,

विपदाओं का जहर है,

थम जाओ अब बस करो ,

परमात्मा सुनो अब तरस करो,

शायद ये चेतावनी है सुधर जाओ,

ख्याल खुद के साथ प्रकर्ती का रखो ,

जीवों और सजीव पर दया दृष्टि रखो,

संकट है कुछ घड़ी का टल जाएगा ,

आएगा नया सबेरा भी ,

फिर से फूल खुशियों का खिल जाएगा

रौनक होगी पुनः गीत खुशियों के गाए जाएंगे ,

रखना ध्यान इस पल का भी तब,

फिर कभी वापस ये पल ना आएंगे ।।

~ हिमांशु आर्य

(दिल्ली यूनिवर्सिटी)