सपनों में उलझा उलझा
हर बीते कल को सुलझा सुलझा
ज्वलित प्रज्वलित कुछ सिला बुझा
हर आज की सुबह सुबह
जो जीवित जगता मैं हूँ
उस मैं में आख़िर कितना मैं हूँ
दुनिया दफ़्तर में घिरा घिरा
क़ैद सा कुछ रिहा रिहा
संभलता सा कुछ गिरा गिरा
ठहरा सा कुछ बहा बहा
हर एक दिन नया नया
लिबास ओढ़े निकलता मैं हूँ
उस मैं में आख़िर कितना मैं हूँ
कर करके दिन भर सुना सुना
रद्द करके कुछ चुना चुना
नया जमा जूना घटा
भागा विचार दुविधा गुणा
देखा अनदेखा कहा सुना
उधड़ा सा कुछ बुना बुना
घर को वापिस चलता मैं हूँ
उस मैं में आख़िर कितना मैं हूँ
ज़ाहिर सा कुछ लुका छुपा
बेबाक़ सा कुछ रुका रुका
राज़ी तन, मन ख़फ़ा ख़फ़ा
मौजी मन, तन थका थका
खुद से झगड़ता हर दफ़ा
मैला सा कुछ सफ़ा सफ़ा
हर शाम डेरे में घुसता मैं हूँ
उस मैं में आख़िर कितना मैं हूँ
मुझे तो ना मिला
उसे क्यों मिला
मुझे कुछ तो मिला
उन्हें क्या ही मिला
कभी ग्लानि में दहका दहका
संतोष कभी महका महका
विचारों में बहका बहका
आत्मभाषण में चहका चहका
नींद की गोद में सरकता मैं हूँ
सोचता हूँ कि क्या यह मैं हूँ
मैं हूँ तो आख़िर कितना मैं हूँ
शांत सा कुछ मचला मचला
काला सा कुछ उजला उजला
पक्का सा कुछ दुबला दुबला
गहरा सा कुछ उथला उथला
बिस्तर में सिसकता मैं हूँ
कितना मैं मैं नहीं
और कितना मैं वाक़ई मैं हूँ
कल चीख थी
पर आज चुप रहा
कल कमज़ोर सामने
आज मज़बूत छुप रहा
क्या ये मेरी आत्मकथा
या संसार की यही व्यथा
कल से आज आज से कल
परिवर्तन जीवन की मूल प्रथा
पाँचो तत्व भी रोज़ बदलते
और हर रोज़ बदलता मैं हूँ
जो कल था या जो कल होगा
उस मैं में आख़िर कितना मैं हूँ
प्रश्न में यह कहता मैं हूँ
विचार में यह रहता मैं हूँ
मुझमें आख़िर कितना मैं हूँ
इस मैं में आख़िर कितना मैं हूँ
खोज में यह “मैं” लिखता मैं हूँ
-Himanshu (Harshvardhan) Joshi


