लोग ही तो हैं
मरते हैं मरने दो
देश ही तो है
जलता है जलने दो
मज़हब क़ायम रखो
धर्म शाश्वत रहने दो
इंसानियत ही तो है
झटके से मार डालो
हलाल से काट डालो
क्या फ़र्क़ पड़ता है
हैवानियत ही तो है
आग सी भड़कने दो
ज़हर सी पनपने दो
क्या फ़र्क़ पड़ता है
मुहब्बत ही तो है
सती करो
विधवा कर दो
तौहीन करो
रुसवा कर दो
क्या फ़र्क़ पड़ता है
नफ़रत ही तो है
शंख सी बजने दो
ऐलान सी गजने दो
गीता पर बिगड़ने दो
क़ुरान से झगड़ने दो
हरी शक्ल में
भगवा शक्ल में
क्या फ़र्क़ पड़ता है
ख़ून ही तो
खौलता है खौलने दो
फैलता है फैलने दो
क्या फ़र्क़ पड़ता है
क़ुदरत से ज़ुबान मिली
विरासत में आज़ादी मिली
जो चाहे बोलने दो
क्या फ़र्क़ पड़ता है
कड़वाहट ही तो है
घुलती है घोलने दो
क्या फ़र्क़ पड़ता है
उम्मीद भरी आँखों को
चुभता है चुभने दो
हमदर्दी भरे दिलों को
दुखता है दुखने दो
क्या फ़र्क़ पड़ता है


