सोच साहब नशा अजब
कश लगाकर देखिए
इस में चूर हो जाइएगा
दुनिया जहाँ भूल जाइएगा
कभी आज़माकर देखिए
सोच साहब लत ग़ज़ब
जिसको यह लत लग जाए
क्या से क्या हो जाए
उसकी गत बदल जाए
आप नशे में डूबे होंगे
हर किसी को खबर न रहेगी
ज्यों आम नशों में हो जाती है
आपकी बात बेअसर न रहेगी
घूँट भर इसकी
ऐसा सुरूर भर देती है
थोड़ा और थोड़ा और
बेहद मजबूर कर देती है
महफ़िल सजायी रात को
सहर ज़रूर कर देती है
नशा ये नायाब है
जहाँ तहाँ नहीं होता
क़द्रदान होते हैं
इसका ख़रीददार नहीं होता
ज़ात मज़हब रंग देश
इसको कोई सरोकार नहीं
सरहद नहीं कोई क़ैद नहीं
इसकी कोई सरकार नहीं
जहाँ चाहो पेश करो कोई ताम झाम नहीं
इसे साक़ी की दरकार नहीं
पर इसे आप बनाना पड़ता है
कहीं मिल जाए, वो बाज़ार नहीं
बंदा झूम लेता है
अर्श भी चूम लेता है
ज़रियों का पाबंद नहीं रहता
कायनात भी घूम लेता है
इसके चलते हुकूमत हुई
इस ही से ख़िलाफ़त हुई
इससे ही इंक़लाब हुआ
इस ही से आज़ाद हुआ
बाक़ी नशे तो लूट लेते हैं
ये नशा कमाकर देता है
रुतबा इज़्ज़त दौलत शौहरत
ये सब सजाकर देता है
जो चाहे कर सकता है
जैसे चाहे रंग भर सकता है
इसे कोई बंधिश नहीं
बेहद ऊँचाई गहराई है
न बिकेगा न लुटेगा
इसे चखने में भलाई है
इसकी कोई मियाद नहीं
बस चढ़ता ही जाएगा
एतिहाद बरतना ग़ुरूर ना मिलाना
तरफ़दारी से ना सुलगाना
हल्का पड़ जाएगा
लत छूट जाएगी
ये नशा टूट जाएगा
- Himanshu (Harshvardhan) Joshi
