*जन्नत बेगम*


क्या पाया ?

सरहद बना कर

जन्नत बेगम के

दो शौहर बना कर


तुम कहो मेरी है

वो कहता उसकी है

क्यों ना बेगम फ़ैसला करे

आख़िर वो खुद किसकी है


जैसे नुमाईश को रखी है

सियासती आज़माईश को रखी है

ना उसे फ़र्क़ पड़ता है 

ना तुम परवाह करते हो

अपने अपने मसले मुददों में

उसे बस तबाह करते हो


नयी नवेली आयी थी

उस दिन से ही बरबाद हुई

औलादें खुद की छिनती रहीं

नस्लें ग़ैरों की आबाद हुईं


बाप पर बारूद 

ख़ून के छींटे

माँ को बेबस

देखा मजबूर खड़ा

ख़ौफ़ ख़लिश में परवरिश

दहशत नफ़रत में सबक़ पढ़ा


बेवफ़ा निकली? 

तो दफ़ना दो

वरना छीन लाओ 

और अपना लो

कब तक यूँ ही टालोगे

ताउम्र रक़ीब पालोगे


जन्नत बेगम के दो शौहर

कोई मगर अपना ना सका

वजूद क्या मुस्तकबिल क्या

कोई कुछ बता न सका


~ हिमाँशु ~