" ज़िंदगी को जीने में 
कभी सिमटे तो कभी मिटे
    क्या ये पहलू है मेरे
कभी अश्को में डूबे तो कभी उभरे

 यही सच है मेरी ज़िंदगी का
    कभी खोये किसी में
 तो कभी भटके किसी में
यही तो हैं लम्हे जो जिये हमने

फिकर किसकी करूँ मैं
 आगे पीछे किसे देखूँ
कहने को तो बहौत है मेरे
वक्त पर कोई ना दिखे मेरे

   ज़िंदगी को जीने में
कभी सिमटे तो कभी मिटे
बस यही जीते ही रहे,कभी
खुद को खुद में ढूढँते ही रहे " ।