यत्र तत्र और सर्वत्र है ये राजनीति का प्रपत्र है अघोषित अनुबंध है भाषाई अपभ्रंश है जिव्हा चीनी से मीठी और छुपा विषदंत है नैतिकता की बात है और अनैतिक रात है अहिंसा की राह में लिए हाथ में शस्त्र है यत्र तत्र और सर्वत्र है ये राजनीति का प्रपत्र है अदभुत संत समागम है राजनीति का भाषण है भ्रष्टाचार से चलता देखो साहब के घर का राशन है धर्म के नाम पर देखो तो हो रहा आज अधर्म है शब्दों की शल्य क्रिया से होता अर्थ का अनर्थ है यत्र तत्र और सर्वत्र है ये राजनीति का प्रपत्र है जिसके पास धन बाहुबल उसके पास ही सत्ता है निर्धन आज ले रिक्त उदर ऊँचे महलों को तकता है चुनाव पंच वर्षीय योजना है प्रश्न पूछना राजनीतिज्ञों से जनता की राष्ट्र आलोचना है ऐसा किस्सा कहाँ अन्यत्र है ये राजनीति का श्वेत पत्र है यत्र तत्र और सर्वत्र है ये राजनीति का प्रपत्र है