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श्वेत पत्र

यत्र तत्र और सर्वत्र है ये राजनीति का प्रपत्र है अघोषित अनुबंध है भाषाई अपभ्रंश है जिव्हा चीनी से मीठी और छुपा विषदंत है नैतिकता की बात है और अनैतिक रात है अहिंसा की राह में लिए हाथ में शस्त्र है यत्र तत्र और सर्वत्र है ये राजनीति का प्रपत्र है अदभुत संत समागम है राजनीति का भाषण है भ्रष्टाचार से चलता देखो साहब के घर का राशन है धर्म के नाम पर देखो तो हो रहा आज अधर्म
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