ये नफरतों का दौर है, आग लगाइये सिक्कों का क्या काम, लूट खाइये छोड़ कर फसल खेतों में उगाना आप नफ़े का सौदा कहूँ, हथियार उगाइये इंसानियत को मिटा के अब ज़माने से बच्चों को इंसान नहीं, जानवर बनाइये ठेकेदारों के बिना तो खुदा नहीं मिलते उनकी बात तो सुनिये, घर जलाइये झूठ की हैसियत आसमानों तक पहुंची सच ज़िंदा न रहे, क़त्ल करवाइये मसीहा की आपको ज़रूरत नहीं कोई लोगों को खौफ दीजिये, मसीहा कहलाइये रंगीन तमाशा जनता को दिखाते रहिये बहला, फुसला, डरा कर, जीत जाइये