वक्त बहुत निकल गया, या यूं कहूं के भाग गया

अब थोड़ा ठहर जाएं,

चलो ज़्यादा नहीं तो एक घंटा ही सही,

हर महीने न सही, साल में दो बार ही सही

कुछ तुम लिखो, कुछ मैं

यकीन है मुझे, के कहने को बहुत कुछ है

बस वक्त और किसी के सुनने की कमी है।

अब वक्त की पाबंदी भी छोड़ो

जब तुम्हारा मन करे, लिख दो,

कुछ तुम मेरे साथ बाटो कुछ मैं बाटू

जिंदगी को अब थोड़ा मैं जी लूं, थोड़ा तुम जी लो।

क्या कहती हो?

बच्चे अब बड़े हो रहे हैं

घर वालों की अपनी परेशानियां हैं

इनको कुछ पल के लिए इनके हाल पे छोड़ दो,

कुछ तुम अपना केहना

कुछ मेरी सुनना।