एक मूर्तिकार ने रास्ते से पत्थर को उठाया। उस से वादा किया। तुम्हें मैं कुछ ऐसा तराश दूंगा के तुम मंदिर में सबसे खूबसूरत मूर्ती होगी, लोग तुम्हें दूर दूर से देखने आयेंगे।

पत्थर भी तैयार हो गया। हथौड़ा छैने से मूर्तिकार पत्थर को तराशता गया। उसके हर सितम को सहता रहा। दिन, महीने, साल गुज़रे, महीन कारीगरी से पत्थर को एक अनोखा रूप मिला।

पत्थर की किस्मत में कुछ और था। मूर्तिकार को खूब वावाही तो मिली मगर मूर्ती मंदिर में नहीं सजी, किसी बड़ी इमारत का हिस्सा भी नहीं बन पाई।

उदास मूर्तिकार ने आखिर उसे एक चौक में सजा दिया। हर रोज़ बहुत तारीफें बटोरती फिर भी मन में उदास रहती। एक दिन एक राहगीर ने उसकी उदासी का कारण पूछा। मूर्ती के पत्थर ने सारी कहानी बयां कर दी।

राहगीर मुस्कुरा कर बोला, शायद अब यह चौक ही मेरा मंदिर है, मूर्तिकार ने आखिर मुझे तराशा भी तो इसीलिए था के लोग मुझे देखें, मेरी तारीफ करें।

पत्थर भी मुस्कुराया, बोला, शायद यही सच मैं मान नहीं पा रहा था। आखिर मुझसे ज़्यादा दुख तो मूर्तिकार को होता होगा। मै तो तब भी रास्ते में पड़ा था, आज भी रास्ते में हूं। फर्क सिर्फ इतना सा है के तब कोई मुझे सिर्फ ठोकर के लायक समझता था, आज मुझे हर कोई शान से निहारता है।


आपके जीवन के कटुसत्य को तराश कर खुश रहने में ही भलाई है।