
जर्रे से खनक कर कुछ सिक्के गिर रहे है।
कुछ पत्तो की सरसराहट है।
कही दबी हुई नमी उस रुख पेड़ की।
तलहटी मैं जश्न मना रही है।।
क्यों अक्सर इन्ही बातो का जिक्र जहन करता है।
क्यों नाम किसी का लब पे आता नहीं।।
क्यों बहाने ढूंढने को सब फिरते है।
क्यों कोई असली वजह बताता नहीं।।
कही और हो तुम कही मैं भी नहीं।
कही खोया खयालो में वीरान जर्
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