ये दिल कबूतर है फुर्र हो जायेगा। कभी आस्मां मैं उन्मुक्त कही उड़ जायेगा।। कभी ओट लिए पलाश के लाल पीले फूलो में। कभी किसी और का दिल हो जायेगा।।

कोई मंतर कर देता है कभी। कोई जादू टोना कर देता है। कभी कोई हुस्न के माया जाल का। कोई मुणी भर देता है।।

बार बार वो कह रही थी। हर रोज घर से निकलते हुए। ध्यान रखना पर ना खोलना। चलना फिर भी पर सँभालते हुए।

कौन समझाए उसे ये कबूतर गंगा के तट का है। ये निर्मल सरल मृदुल जल सा है।। सब कुछ समाया है निर्माण और प्रलय इसमें। ये तो बस उस शैलजा का बस एक भोला है।।

क्या ये दिल कबूतर है फुर्र हो जायेगा।!!! ®(हैयान)