अपनी ही दूकान मैं सारे,

गूंगे बहरे बैठे।

एक दो ही बोलते है,

बाकी सब सुनते है।

जाजम से परहेज़ करते,

सब कुर्सी पर बैठे है।

पँखे, ऐ सी सब चालू हूँ,

रजाई ओढ़े बैठे है।

खाने को सब्सिडी मिलती ,

5 सितारा के वेटर है।

उगाने वाला भूखा मरता,

सब के सब चटोरे है।

मजदूर, किसान, गरीब की बातें,

यहाँ तो सब करते है।

सुनते नहीं किसी की बातें,

बस बातें ही बातें करते है।

विरोध करें जो बाहर बैठा,

नौकर भी धुतकार देते है।

जो आवाज उठाए, एक पर भी,

गद्दार, विरोधी कहते है।

सब बेच देंगे जो बचा कुचा है,

व्यापारी जो ठहरे है।

दुकानों के मालिक आज कल,

सब बेचने को निकले है।

षड्यंत्र रच कर उस जगह पर,

अपराधी भेज देते है।

जहाँ चिड़िया पहुँच नही पाती,

बिना वीजा के वो पहुचते है।

कौन मिला है गद्दारों से,

आज ये दुनियां पूछती है।

सब को पता है कौन है वो,

सब मुह दबाएँ बैठे है।

किसानों के नाम पर जाने,

किसने पैसे कमाए है।

भूखें नंगे मजदूरों ने तो,

पेट भी कटाये है।

अन्यायी है जो अंधे है वो,

देखते नहीं सच्चाई को,

भारत माँ का लाल है कहते खुद को,

वो देश बेच खाए है।

वो देश बेच खाए है।

वो देश बेच खाए है।

®(हैयान)

01:18 रात्र

16 फरवरी 2021

घाटा का गाँव