एक खिलौना टूटा है,

बचपन का साथ छूटा है।

खेलने की अब उमर गुजरी,

वो सपना भी टूटा है।


डांट पड़ती थी अब्बू से,

अम्मी के दामन में छुपता था।

वक़्त गुजरा रेत जैसा,

गाँव भी अपना छूटा था।


सपनों की उड़ानों को भरने में,

थपेड़े समय के खाता था,

मिला कुछ जरूरत से कम,

अपनों का साथ छूटा था।


वापस मुड़ कर देखा नहीं कभी,

लगता है आँगन पुकारता था।

कुछ बचपन रह गया है वहाँ,

जहाँ तेरा साथ छूटा था।


किसी मोड़ पर मिल जाओ अगर,

पूछना ना हाल कैसा था,

रो पडू शायद मिलकर,

जो रोना पीछे छूटा था।


मुस्कुरा ही देना तुम ज़रा,

गर मुस्कुराना पीछे छूटा था,

याद ना दिलाना उस बचपन की,

जो बचपन पीछे छूटा था।

®(हैयान)

हिमांक पंड्या

09:27 सांय

20 फरवरी 2021

घाटा का गाँव