ना सोये हे ऋषि पुत्र ना सोये है अग्निकुंडोत्पन्न। जग गए है संहारोत्सङ्गर्ष देवधरा प्रचंड। कुछ होम कर शक्तियुक्त हुए है। कुछ रक्तरंजीत भाल से प्रवर हुए है। लड़ने को सब आतुर विकल। प्रणयमृत्यु को जीवित हुए है।

हे मान धरा का उदय हुआ। दीप कुलवंश का अभ्युदय हुआ। मान चढ़ा सम्मान चढ़ा कर। ये युवयुग शूरवीर हुआ।।

आज चढ़ा दो लहू वक़्त पे। सब और कोलाहल होने दो। सब भगीरथ बन कर जीवन में। आज प्रथा वक़्त की बदलने दो।

दिखा दो युग-युग को। युव-युव फिर से जग गया। करके हाथोहाथ एक दूजे को। युव-युग फिर से जीत लिया।

अमीतमुंड धरा पे कतल हुए। या झुण्ड वीरो के मसल गए। आओ इस नव निर्माण को। सब मिलकर जग में अमर होए। ®(हैयान)